वास्तु देव को कैसे करे संतुष्ट? वास्तुदेव की उत्पत्ति कैसे हुई, उनका मूल स्वरूप व् मन्त्र क्या है!

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वास्तु देव को कैसे करे संतुष्ट? वास्तुदेव की उत्पत्ति कैसे हुई, उनका मूल स्वरूप व् मन्त्र क्या है!

How to satisfy Vastu Dev? How did Vastu Dev originated, what is his basic form and mantra!

समाज विकास संवाद!

मुंबई,

वास्तु देव को कैसे करे संतुष्ट? वास्तुदेव की उत्पत्ति कैसे हुई, उनका मूल स्वरूप व् मन्त्र क्या है!

निवास स्थान अर्थात जिस भूमि पर हम निवास करते हैं, उसे ही वास्तु के स्वरुप में जाना जाता है।

किसी भी निवास स्थान का वास्तु शुभ अत्यंत शुभ होना आव्यश्यक होता है ,

एक अच्छे पारिवारिक जीवन बिताने के लिए! निवासस्थान में वास्तु का प्रभाव शुभ रहने पर

उन स्थान के निवासियों को अपार पारिवारिक सुख-सौभाग्य और धन समृद्धि प्राप्त होता है,

वहीँ पर किसी भी अशुभ वास्तु स्थान अथवा दोष युक्त वास्तु स्थान में निवास करने का परिणाम अत्यंत हानिकारक होता हैं।

वास्तुदेवता की पूजा के लिए वास्तु की प्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है ।

वास्तुचक्र अनेक प्रकार के होते हैं । अलग-अलग अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तुचक्र बनाने का विधान है ।

वास्तु कलश में वास्तुदेवता (वास्तोष्पति) की पूजा कर उनसे सब प्रकार की शान्ति व कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

कौन हैं वास्तु देवता!

कौन हैं वास्तु देवता!

प्राचीन काल के वैदिक मान्यता के अनुसार मत्स्यपुराण में वास्तु पुरुष का सम्यक वर्णन है,

पुराण में अन्धकासुर नामक असुर का निधन करते समय भगवान शंकर के ललाट अर्थात

कपाल से पृथ्वी पर स्वेदबिन्दु अर्थात पसीने की एक बूंदें; गिर परा था,

वही स्वेद्बिंदु से से एक भयंकर आकृति वाला दिव्या पुरुष प्रकट हुआ!

जिनका विकराल मुंह फैलाये हुए था ।

इन विकराल पुरुष उस युद्ध क्षेत्र में उपस्थित अन्धकासुर दैत्य के सारे सैन्य का निधन कर उन सभी का रक्तपान कर लिया फिरभी,

उसे तृप्ति नहीं हुई ; तब उसने भूख से व्याकुल होकर सयं भगवान् त्रिलोकी शिव जी का भक्षण करने के लिए अग्रसर हुआ ।

इसी वक्त भगवान शंकर एवं वहां पर उपस्थित सभी देवताओं ने मिलकर उसे पृथ्वी पर पीठ के बल सुला दिया एवं

उसी विकराल दिव्या पुरुष को वास्तु देवता अर्थात वास्तुपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया!

कियुंकी सभी देवतओं ने उसे सुलाते वक्त उसे पाकर रखे थे इसीलिए उसके शरीर में सभी देवताओं के अंश का वास हो गया!

जिस किसी देवतओं ने उसे जिस दिशा से पकडे थे; इसीलिए उन देवतओं का निवास भी वास्तु देवता या

वास्तुपुरुष के देह के ठीक उसी दिशा नाम से प्रतिष्ठित हो गया!

यज्ञ आदि के समय वास्तुदेवता की पूजा का विधान है!

उसे पृथ्वी पर स्थापन करने के पश्चात देवताओं ने देवादिदेव शंकर के निर्देश द्वारा उसे धरती पर होने वाले गृह निर्माण,

वैश्वदेव बलि, पूजन-यज्ञ सहित सभी मंगल कार्य के समय पूजित होने का वरदान दिया ।

सभी देवताओं ने मिलकर उसे वरदान दिया कि तुम्हारी सब मनुष्य पूजा करेंगे एवं

तुम्हारी श्रद्धापूर्वक पूजा किये बिना मनुष्य को आपने निवास पर अनुकूल व् आशारूप सुख समृद्धि का प्राप्ति नहीं होगा।

इसी लिए वास्तु शाश्त्र में तालाब, कुएं खोदने वक्त , गृह, मन्दिर अथवा किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य के समय,

किसी भी वास्तु का जीर्णोद्धार के समय , कोई भी नगर का स्थापन करते वक्त पर ,

किसी भी शुभ यज्ञ-मण्डप के निर्माण व यज्ञ आदि के समय वास्तुदेवता की पूजा का विधान है ।

कैसे करे वास्तु देवता का ध्यान!

वास्तु देवता का ध्यान इस अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र द्वारा किया जा सकता है!

श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाद्यैरलंकृतम् ।
पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम् ।।
पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभ्रूपशोभितम् ।
करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम् ।।

हे वास्तुदेवता आप, श्वेत वर्ण के, चार भुजा वाले, शान्तस्वरूप, और कुण्डलों से सुशोभित हैं ।

आपके हाथ में पुस्तक, अक्षमाला, वरद और आप अभय की मुद्रा धारण किये हुए हैं ।

आप पितरों और वैश्वानर से युक्त हैं तथा उनकी भौंहें कुटिल (तिरछी) हैं । आपका मुख भयंकर स्वरुप है ।

आपके हाथ घुटनों तक लम्बे हैं । आप सदैव यह स्थान पर शुभ रूप से बिराजने की कृपा करे!

किसी भी स्थान पर वास्तु देवता की पूजा करने से पहले वास्तु देवता की प्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है ।

पुरानो के अनुसार वास्तुचक्र अनेक प्रकार के होते हैं । अलग-अलग अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तुचक्र बनाने का विधान है ।

पूजा स्थान में वास्तु कलश में वास्तु देवता (वास्तोष्पति) की पूजा करने के उपरांत;

उनसे सब प्रकार की शान्ति व कल्याण की प्रार्थना किया जाना चाहिए।

वास्तुदेवता की स्तुति हेतु मूल मन्त्र क्या है!

ऋग्वेद के अनुसारवास्तुदेवता का मूल मन्त्र इस प्रकार है!

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो भवान: ।
यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ।।

अर्थात!  हे वास्तुदेव ! हम आपके सच्चे उपासक हैं ,

इस पर पूर्ण विश्वास करें और तदनन्तर हमारी स्तुति-प्रार्थनाओं को सुनकर आप हम सभी उपासकों को

आधि-व्याधि मुक्त कर दें और जो हम अपने धन-ऐश्वर्य की कामना करते हैं,

आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृह में निवास करने वाले

हमारे स्त्री-पुत्रादि परिवार-परिजनों के लिए कल्याणकारक हों तथा हमारे अधीनस्थ गौ, घोड़े सहित

सभी चतुस्पद वाले प्राणियों का भी कल्याण करें ।

वास्तु पुरुष के किस दिशा में कौन से देवता का निवास है !

वास्तु पुरुष के उत्तर दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है।

जिससे आर्थिक मामले और वैवाहिक व यौन संबंध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

वास्तु देवता के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) के देवता सूर्य हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता हैं।

इससे जागरूकता और बुद्धि तथा ज्ञान मामले प्रभावित होते हैं।

वास्तु पुरुष के पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं जिन्हें देवराज कहा जाता है।

वैसे आम तौर पर सूर्य ही को इस दिशा का स्वामी माना जाता जो प्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को रोशनी और ऊर्जा दे रहे हैं।

लेकिन वास्तुनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते हैं। जिससे सुख-संतोष तथा आत्मविश्वास प्रभावित होता है।

वास्तु देव के दक्षिण-पूर्व (अग्नेय कोण) के देवता अग्नि देव हैं जो अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिससे पाचन शक्ति तथा धन और स्वास्थ्य मामले प्रभावित होते हैं।

वास्तु पुरुष के दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं

वास्तु पुरुष के दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते हैं।

जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। इनकी प्रसन्नता से धन, सफलता, खुशियाँ व शांति प्राप्ति होती है।

वास्तु देवता के दक्षिण-पश्चिम दिशा के देवता निरती हैं जिन्हे दैत्यों का स्वामी कहा जाता है।

जिससे आत्मशुद्धता और रिश्तों में सहयोग तथा मजबूती एव आयु प्रभावित होती है।

वास्तु पुरुष के पश्चिम दिशा के देवता वरूण देव हैं जिन्हें जलतत्व का स्वामी कहा जाता है।

जो अखिल विश्व में वर्षा करने और रोकने का कार्य संचालित करते हैं।

जिससे सौभाग्य, समृद्धि एवं पारिवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है।

वास्तु देवता के उत्तर-पश्चिम के देवता पवन देव है। जो हवा के स्वामी हैं।

जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है। यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी योग्यता,

योजनाओं एवं बच्चों को प्रभावित करती है।

पृथ्वी की पंच तत्वों के संचालन में अहम भूमिका निभाते हैं वास्तु शास्त्र में निर्धारित किया गया दिशा।

जिन पंच तत्वों का का पुतला बना हुआ है हम मानव!

अगर मनुष्य पृथ्वी के पंचतत्व संचालन की दिशाओं के अनुकूल रहे तो यह

दिशाएं आपको रंक से राजा बना जीवन में रस रंग भर देती हैं।

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