आधुनिक जीवन मैं आयुर्वेद का महत्व – आयुषो वेदः इति आयुर्वेदः

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आधुनिक जीवन मैं आयुर्वेद का महत्व – आयुषो वेदः इति आयुर्वेदः

Importance of Ayurveda in modern life – “Ayusho Veda: Iti Ayurveda”

आयुर्वेदाचार्य डॉ नयना वासनी,

समाज विकास संवाद!

मुंबई,

इस अभिलेख के माध्यम से मैं आयुर्वेद की परिभाषा , उसका रूप एवम

दैनंदिन जीवनशैली मे उसकी सुसंगतता दर्शाने का प्रयास कर रही हूँ ।

“आयुषो वेदः इति आयुर्वेदः”

आयुर्वेद अति प्राचीन शास्त्र है,  प्राचीन आचार्यो ने आयुर्वेद को शाश्वत एवं अनादि कहा है l

जिसमें “आयुष अर्थात जीवन और वेद अर्थात ज्ञान” –

ऐसे जीवन विषयक सम्यक ज्ञान का वर्णन आयुर्वेद में किया गया है I

मानव या प्राणी मात्र सृष्टि के आरम्भ से ही स्वयम के हित-अहित आयु ,

आयु व्रुद्धिकारक एवम आयु विनाशकारक बातों का ज्ञान रखते आये हैं और

आयु को नियोगी रखने के लिये नये नये संशोधन का अवलम्बन करते आये हैं I

जिस ग्रंथ में हित आयु , अहित आयु, सुखायु, दुखायु के लिये पथ्यापथ्य का प्रमाण,

उनका स्वरूप बताया गया है , वह आयुर्वेद शास्त्र है I इसी लिये कहा गया है…

हिताहितम सुखंदुखमायुस्तस्य हिताहितम । 

मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेद स उच्यते”

 

शरीर, इंद्रिय,आत्मा एवं मन (सत्य) के संयोग को आयु कहते हैं!

The combination of body, sense, soul and mind (satva) is called age or Life Span.

शरीर, इंद्रिय,आत्मा एवं मन (सत्य) के संयोग को आयु कहते हैं ,

जो चेतन अर्थात पुमान है , चिकित्सा इसी चेतन पुरुष की होती है ।

आयुर्वेद के मतानुसार शरीर त्रिदोष- वात, पित्त, कफ, सप्त धातु- रस,रक्त,माँस, मेद,

अस्थि , मज्जा, शुक्र, त्रिमल- मल, मूत्र एवं पुरिष से बना हुआ है.

 

त्रिदोष, सप्तधातु, त्रिमल का सम्यक अवस्था मे होना ही आरोग्य की निशानी है. 

इन तीनों में से कीसी एक का भी असम्यक अवस्था में होना रोग की निशानी है.

शरीर एवं मन जिस तरह से रोग के आश्रय स्थान हैं,  वैसे ही सुख का आश्रय स्थान मन एवं शरीर ही है.

आज से कई हजार वर्ष पूर्व आचार्य सुश्रुत ने कहा भी है…

समदोष: समाग्निश्च समधातुमलक्रिय: । 

प्रसन्नात्मेंद्रियमन: स्वस्थ इत्यभीधियते“।। 

अर्थात जिस व्यक्ति का दोष. धातु,मल सम अर्थात विकार रहित हो, जिसकी इंद्रिय ,

मन तथा आत्मा प्रसन्न हो, वे स्वस्थ हैं.

 

आयुर्वेद में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य को भी महत्वपूर्ण माना है!

In Ayurveda, not only physical health, mental health is also considered important!

यहां ये प्रतीत होता है आयुर्वेद में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य को भी

महत्वपूर्ण माना है और स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मन को ही पूर्ण स्वास्थ्य अर्थात

total health कहा जाता है.

 

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“Health is a state of complete physical, mental,

spiritual and social well being and not merely the absence of disease.”

आज की WHO- WORLD HEALTH ORGANISATION की उपरोक्त परिभाषा

आचार्य सुश्रुत द्वारा हज़ारों साल पूर्व की गयी परिभाषा से सुसंगत है,

जिसमें शरीर एवं मन दोनों के स्वास्थ्य की महत्ता बताई है.

 

शारीरिक स्वास्थ्य – सुखायु एवं उसके विपरीत दुखायु हो सकता हैI

Physical health – peaceful or Pathetic Physical Condition.

शारीरिक स्वास्थ्य – सुखायु एवं उसके विपरीत दुखायु हो सकता है.

मानसिक स्वास्थ्य में मनुष्य के मनोबल ,सुचारु विचार एवं संस्कार का समावेश होता है.

इसके अलावा सामाजिक  स्वास्थ्य – Social Health भी महत्वपूर्ण है.

सामाजिक स्वास्थ्य के लिये मानसिक स्वास्थ्य होना आवश्यक है.

मनुष्य के सुखायु, दुखायु, हितायु, अहितायु का संबंध मानसिक स्वास्थ्य के साथ भी होता है.

आयुर्वेद का प्रयोजन: ” स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम आतुरस्यविकार प्रशमनम” 

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं आतुर के विकारों को शांत करना

आयुर्वेद का प्रयोजन है, जिसके लिये स्वस्थवृत्त का पालन करना चाहिये , क्या है ये स्वस्थवृत्त ?

स्वास्थ्य रक्षण के लिये स्वस्थ पुरुष के द्वारा दैनंदिन जीवन में पालन किये जाने वाले

दिनचर्या के नियमों का आयुर्वेद में वर्णन किया गया है, जिसे स्वस्थवृत्त कहा जाता है।

इसके आगे हम दिनचर्या के नियमों पर विचार करेंगे.

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