आयुर्वेद की संकल्पना एवं पंचकर्म द्वारा पाए स्वस्थ व् सुन्दर जीवन!

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आयुर्वेद की संकल्पना एवं पंचकर्म द्वारा पाए स्वस्थ व् सुन्दर जीवन!

Following the Concept of Ayurveda leads to a healthy and beautiful life achieved through Panchakarma!

डॉ. नयना मनोज वसाणी,

समाज विकास संवाद,

मुंबई,

मित्रो, आज हम चर्चा करेंगे आयुर्वेद संकल्पना एवं पंचकर्म द्वारा कैसे पाया जा सकता है स्वस्थ व् सुन्दर जीवन!

आजकल हम केरला आयुर्वेद ट्रीटमेंट या अलग अलग पार्लर में पंचकर्म स्पा शब्द फैशन के बारेमें सुनते हैं,

लेकिन पंचकर्म ये सिर्फ मसाज पद्धति या फैशन नहीं है ।

आयुर्वेद हमारा प्राचीन शाश्त्र है और आयुर्वेद शास्त्र में पंचकर्म चिकित्सा पद्धति का एक विशिष्ट स्थान है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा को भी उसके विषय के हिसाब से आठ अलग अलग भागों में बांटा गया है।

इन आठ भागों के सम्मिलित रुप को ही ‘अष्टांग आयुर्वेद’ का नाम दिया गया है।

१) काय चिकित्सा (Internal Medicine),

२) बालरोग चिकित्सा (Pediatrics),

३) भूतविद्या (Psychiatry and Exorcism),

४) शल्य चिकित्सा (Surgery),

५) शालाक्य तंत्र (ENT and Ophthalmology),

६) अगद तंत्र (Toxicology),

७) रसायन तंत्र (Treatment for Rejuvenation),

८) वाजीकरण तंत्र (Treatment for Infertility and विरिलिटी)

पंचकर्म – यह कायचिकित्सा से साध्य ऐसी बिमारियों का प्रमुख रूपसे साधनोपाय है ।

Panchakarma – This is the main means of such diseases, which is practicable.

पंचकर्म यह सिर्फ कायचिकित्सा का हिस्सा ही नहीं किन्तु एक स्वतंत्र विज्ञान है ऐसा कहने में भी कोई अतिशयोक्ती नहीं होगी।

क्या है यह पंचकर्म?  उसका प्रयोजन, प्रयोग, विषय, क्षेत्र  (scope) इन सभी बातों का विचार करना महत्त्वपूर्ण है

क्यूंकि पंचकर्म को लेकर कईं भ्रांतियां फैली हुई है ।

पंचकर्म को समझने से पहले पंचकर्म जिस शास्त्र में वर्णित है

उस आयुर्वेद शास्त्र की संकल्पना को समजना अति आवश्यक है ।

आयुर्वेद यह हर एक व्यक्ति विशेष और हर स्थान पर रहनेवाली ऊर्जा के तीन मूल तत्वों पर आधारित है-

वात , पित्त, कफ। शरीर के मूल, जीव सातत्य के साथ इन तत्वों को (जिन्हें त्रिदोष कहा जाता है) जोड़ा जाता है,

इन तीनों दोषों से व्यक्ति की प्रकृति निर्धारित होती है।

शरीर की सभी क्रियाओंके लिए शक्ति या ऊर्जा का होना आवश्यक है।

It is necessary to have strength or energy for all the activities of the body.

शरीर की सभी क्रियाओंके लिए शक्ति या ऊर्जा का होना आवश्यक है।यह क्रियाएं ज्यादातर पुनर्निर्माण की होती है,

हलनचलन के लिए गति के लिए वात ऊर्जा , पाचन चाय- अपचय के लिए पित्त ऊर्जा एवं

शरीर के अवयवों में स्निग्धता स्थैर्य के लिए कफ ऊर्जा  का प्रयोग होता है।

सभी व्यक्तियों में वात, पित्त, कफ ये तीनों दोष विद्यमान होते हैं।

इन तीनों में से किसी एक की प्रधानता, दूसरा दुय्यम स्थिति और तीसरा थोड़ा कम महत्व की स्थिति में होता है।

जिस व्यक्ति में जिस दोष की प्रधानता होती है उसी दोष के हिसाबसे उस व्यक्ति की प्रकृति निर्धारित होती है।

जैसे यदि वात की प्रधानता हो तो वातिक प्रकृति,

पित्त की प्रधानता हो तो पैत्तिक प्रकृति और कफ की प्रधानता हो तो श्लेष्मिक प्रकृति मानी जाती है।

कभी कभी व्यक्ति में एक दोष के बदले दो दोषों की प्रधानता वाले गुण प्रतीत होते हैं

तब उनकी द्वंद्व प्रकृति मानी जाती है जैसे की वातपैत्तिक , वातश्लेष्मिक  आदि ।

त्रिदोष में से किसी एक, दो या सभी की कमी या अधिकता के परिणाम स्वरुप शरीर में होनेवाली विकृति रोग का कारण होता है।

शरीर में इस प्रकार निर्मित होनेवाले विष द्रव्यों के कारण ही रोगों की उत्पत्ति होती है और इसी विष द्रव्य को “आम” कहा जाता है।

आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार व्यक्ति का संतुलन शरीर, मन एवं चेतना की एकत्र समतूला से ही होता है!

According to Ayurveda Shastra, the balance of a person is only from the collected equilibrium of body, mind and consciousness!

आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार व्यक्ति का संतुलन शरीर, मन एवं चेतना की एकत्र समतूला से ही होता है,

अतः इन तीनों दोषों का शरीर में कार्य समझना भी आवश्यक है।

आयुर्वेद यह मानता है की समग्र ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का लेनदेन पांच महत्वपूर्ण घटकों के द्वारा होता है

1) पृथ्वी २) जल  ३) अग्नि ४) वायु ५) आकाश ,

विश्व की निर्मिती इन्ही पांच घटकों के द्वारा हुई है जिन्हें ” पंचमहाभूत” कहा जाता है।

इसे आयुर्वेद ने कईं हज़ार वर्ष  पूर्व स्वीकार किया है और इसिलए कहा है –

” यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” – अर्थात विश्व के सभी घटक सूक्ष्म रूपसे हमारे शरीर में विद्यमान हैं।

अतः इन्हीं पंचमहाभूतों  से विश्व बना है और

यही पंचमहाभूत हमारे शरीर में विद्यमान होनेसे शरीर से सम्बंधित कोई भी बात इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर समजायी जा सकती है।

अतः शरीरका स्थूल भाग पृथ्वीसे ,

पाचन करनेवाले रस या ऊष्मा निर्मित करनेवाले घटक अग्निसे,

रस रक्तादि धातु जल से, वाहिनिओंमें या अवयवों में रहनेवाला अवकाश या खालीपन( रिक्तता)  आकाश से और

सभी घटकोंकी चंचलता, सूक्ष्मता , गति यह वायु महाभूत की वजह से होती है।

आयुर्वेद के अनुसार शरीर ये त्रिदोष, सप्त धातु, त्रिमल से बना है!

According to Ayurveda, the body is made of tridosha, sapta dhatu, trimal!

आयुर्वेद के अनुसार शरीर ये त्रिदोष, सप्त धातु, त्रिमल से बना है।

त्रिदोष के बाद अब हम धातुओंकी चर्चा करेंगे।

धातु यह शरीर का प्रमुख कोष घटक होने की वजह से शरीर को सुदृढ़ रखता है।

अलग अलग अन्नके रसायनमेंसे विविध धातुओंका निर्माण होता है।

हरेक धातु का योग्य प्रकारसे निर्माण और उनका योग्य रूपसे कार्य ही शरीर को स्वस्थ बनाये रझता है।

रस, रक्त, अस्थि, मांस, मेद, मज्जा और शुक्र ये सप्त धातु हैं।

मल यह शरीर की चयापचय क्रियासे उत्पन्न होता है।

यपग्य रूपसे मल का उत्सर्जित होना आरोग्य की निशानी है  अन्यथा वह रोगोत्पत्ति का कारण बनता है।

मल, मूत्र, स्वेद यह तीन मल आयुर्बेद में बताये गए हैं।

इस प्रकार त्रिदोष, सप्तधातु और त्रिमल का प्रत्यक्ष या परोक्ष संतुलन ही आरोग्य की निशानी है।

समदोषः समाग्निश्च समधातुः मलक्रियः ।

प्रसन्नात्मेन्द्रियमना स्वस्थ इति भिधीयते ॥

इसके बाद आगे हम अगले अंकमें पंचकर्म की चर्चा करेंगे…….

धन्यवाद!

डॉ. नयना मनोज वसाणी, से संपर्क हेतु यह लिंक व् संपर्क नो. उपलब्ध है!

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