आयुर्वेद संकल्पना एवं पंचकर्म – कैसे बिताये स्वास्थ्यकर व् निरोगी जीवन? भाग-२

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आयुर्वेद संकल्पना एवं पंचकर्म – कैसे बिताये स्वास्थ्यकर व् निरोगी जीवन? भाग-२

Ayurveda Concept and Panchakarma – How to spend a healthy and healthy life? Part-2

 

डॉ. नैना म. वसानी,

आयुर्वेद तज्ञ। 

समाज विकास संवाद!

आयुर्वेद संकल्पना एवं पंचकर्म – कैसे बिताये स्वास्थ्यकर व् निरोगी जीवन???

इससे पहले हमने आयुर्वेद और पंचकर्म की प्रारंभिक चर्चा की है । अब हम आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म  की विस्तार से चर्चा करेँगे I

पंचकर्म: चय- अपचय क्रिया , आहार एवं जड़ीबूटी औषधियों के द्वारा शरीर की करनेवाली शुद्धिकरण प्रक्रिया अर्थात पंचकर्म I

जीर्ण व्याधियोंको दूर करने के लिए अर्थात दीर्घकालीन रोगों से मुक्ति पानेके लिए आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है I

शरीरसे त्याग किये हुए पदार्थ बाहर निकलनेसे शरीर शुद्ध हो जाता है ! और; मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है I

आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म शब्द की व्युत्पत्ति पंच + कर्म से होती है । पांच प्रकार के उपचार कर्म अर्थात पंचकर्म ।

आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म में निम्न पांच उपचार कर्म का समावेश होता है ।

पंचकर्म में निम्न पांच उपचार कर्म का समावेश होता है ।

१) वमन

२) विरेचन

३) बस्ति

४) नस्य

५) रक्तमोक्षण

१) वमन :

वमन का सामान्य अर्थ होता है उल्टियाँ कराना । वमन यह उर्ध्वभाग हर शोधन क्रिया है अर्थार्त प्रकुपित दोषोंका ऊर्ध्वमार्ग से अर्थात

मुख से बहार निकालना वमन कहलाता है । औषधि द्रव्यों की सहायता से उल्टियां कराना वमन होता है ।

वमन यह संशोधन कर्म का प्रकार है । स्वस्थान से दूर ले जाकर प्रकुपित दोषों का उर्ध्व मार्ग या; अधो मार्ग से जो निष्कासन याने संशोधन । वमन को उर्ध्व विरेचन भी कहते हैं ।

क्या है आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म अंतर्गत तत्रदोषहरणं उर्ध्व भागे वमन संज्ञकं ?

तत्रदोषहरणं उर्ध्व भागे वमन संज्ञकं ।

कफ दोष की वृद्धि से होनेवाले तीव्र रोगोंमें वमन कराया जाता है । आश्रयस्थान से निकटवर्ती हो ऐसे मार्गसे दोषों का निष्कासन करना

यह आयुर्वेद का सिद्धांत है । कफ का स्थान उर्ध्वभाग में हैं और आमाशय कफ का प्रमुख स्थान है इसीलिए मुख से वमन प्रक्रिया द्वारा

कफ का निष्कासन करना आयुर्वेदानुसार स्वीकृत है । वमन यह स्वरस, चूर्ण, काढ़ा आदि औषधियोंसे कराया जाता है ।

हर एक इंसान की रूचि अलग अलग होती है, किसीको चूर्ण, किसीको स्वरस या काढेसे नफरत होती है।

उनको उस हिसाबसे अनुकूल द्रव्य कल्पनाओं के साथ वमनीय द्रव्यों का सेवन कराया जाता है । आयुर्वेद में वर्णित वमन द्रव्योंको व्याधि

अनुसार , मात्रा अनुसार, ऋतु अनुसार कालानुसार , रोगी बलाबलनुसार उपयोग में लेकर रोगीमें नियंत्रित मतली या उलटी करायी जाती है;

और शरीर में संचित हुए दूषित कफ को दूर किया जाता है। इसका प्रयोग जीर्ण अस्थमा और तीव्र पित्त के लिए किया जाता है ।

वमन छोटे बच्चे, वृद्ध व्यक्ति , कृशकाय एवं गर्भिणी में वमन कराना निषिद्ध है । वमन यह वैद्य के निरिक्षण में की जानेवाली

प्रक्रिया है । वमन के जो वेग आते हैं उस वक़्त रक्तदाब, नाड़ी परिक्षण का करते रहना चाहिए ।

रोगी को जब मतली के वेग जब आते हैं तब आतंरिक श्लेष्मल कला का नुक्सान ना हो और, आतंरिक रक्तस्त्राव ना हो उसका विशेष

ध्यान रखना ज़रूरी है ।

क्या होता है आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म अंतर्गत विरेचन ?- तत्रदोषहरणं अधोभागम विरेचन संज्ञकं ।

विरेचन अर्थात! तत्रदोषहरणं अधोभागम विरेचन संज्ञकं । आयुर्वेद शास्त्र में गुद मार्ग से दोषों का निर्हरण करना विरेचन कहलाता है ।

विरेचन अधोभागहर शोधन प्रक्रिया है! अर्थात; आमशयाश्रित दोषों को निचे की ओरले जाकर गुदा मार्गसे निर्हरण करना विरेचन

कहलाता है । तब प्रश्न उठता है गुदा द्वारा निर्हरण बस्ति ( एनीमा) से भी होता है तो विरेचन और बस्ति में क्या फर्क होता है ।

उसका जवाब यह है की विरेचन आमाशय गत दोषों का गुदा मार्ग से निर्हरण करता है जब कि बस्ति सिर्फ अधोभाग से

मल निर्हरण कराती है । पित्त दोष के कारण निर्माण होनेवाले तीव्र रोगों में विरेचन पद्धति का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रक्रिया के दौरान रोगी को रेचक दवाइयों का सेवन कराया जाता है । कृमि उपद्रव, कामला, त्वचा रोग जो कि पित्त दोष दूषित होने के

कारण और अन्य पित्त प्रधान व्याधियों में विरेचन अच्छा परिणाम देता है । छोटे बालक, वृद्ध व्यक्ति और गर्भिणियों में विरेचन निषिद्ध है ।

विरेचन के दौरान रुग्ण को वैद्यके निरिक्षण में रहना अति आवश्यक है, इसके अलावा विरेचन के दौरान थोड़ी थोड़ी मात्रा में

शुद्ध जल का सेवन करते रहना चाहिए जिससे शरीर में द्रव कि कमी होकर डिहाइड्रेशन न होने पाए ।

क्या है ? आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म अंतर्गत बस्ति:! बस्तिना दीयते इति बस्ति: ।

बस्ति: बस्तिना दीयते इति बस्ति: ।

गुदा मार्ग द्वारा चढ़ाये जानेवाले रेचक द्रव्यों को बस्ति कहा जाता है। वातजन्य बिमारियों में बस्ति यह उत्तम लाभदायी है।

बस्ति शरीरमें प्रविष्ट कराये जाने के बाद कुछ समय तक शरीर में रहती है ! इसीलिए बस्ति कहा जाता है ।

बस्ति के अंतर्गत निरुह बस्ति, अनुवासन बस्ति और उत्तर बस्ति का समावेश होता है ।

बस्ति एक प्रक्रिया है जिसमे गुदामार्ग से औषधि सिद्ध क्वाथ, स्नेह, क्षीर, मांसरसजानेवाली बस्ती , रक्तादि द्रव्यों को पक्वाशय द्वारा

प्रविष्ट कराया जाता है । मूत्र मार्ग या अपत्य मार्ग द्वारा दी जानेवाली बस्ति को उत्तर बस्ति कहा जाता है।

एक समाज ऐसी भी है की बस्ति अर्थात एनिमा।आधुनिक शास्त्र के एनिमा को बस्ति समझना एक भूल है।

बस्ति के अनेकों प्रकार में से एक प्रकार एनिमा कहे सकते हैं किन्तु सभी बस्ति कर्मों को एनिमा कहना गलत होगा ।

साधारणतः: एनिमा मल निष्कासन के लिए दिया जाता है जब कि अनेक औषधियों के संयोग के कारण बस्ति यह दोषों का

शोधन करके संशमन करती है। बस्ति यह शरीर के प्रत्येक अवयव के लिए लाभकारी ऐसी प्रशस्त चिकित्सा है,

शरीर में होनेवाले रोगों का प्रसार शाखा, कोष्ठ, या मर्म इन तीन मार्ग में होता है।

प्रकुपित दोषों काप्रसार इन तीनो भागोंमें वायु दोष करता है ।

बस्ति यह वात दोष कि परम श्रेष्ठ चिकित्सा है । बस्ति यह वातजन्य व्याधि, संधिगतवात, पीठ दर्द के लिए अति उपयुक्त चिकित्सा है,

बालक, वृद्धजन, गर्भिणी में बस्ति वर्ज्य है। बस्ति वैद्यके निरिक्षण में ही लेनी चाहिय्रे ।

आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म सिद्धांत में नस्य: क्या है? नस्य: अर्थात! नासायां भवं नस्यम ।

नस्य:  नासायां भवं नस्यम ।

नासा यह शीर्ष का द्वार है । नासमार्ग से दी जानेवाली औषधि या औषधि सिद्ध स्नेह को नस्य कहते है। ऊर्ध्वजत्रुगत विकारों में नस्य की

विशेष उपयोगिता है। नासाद्वार से प्रविष्ट औषधियां शिर में व्याप्त होकर विकारों को नष्ट करती है। नस्य को ही शिरोविरेचन,

शिरोविरेक या मूर्धविरेचन भी कहते हैं। औषधि के क्वाथ, चूर्ण या तेल की बूँदें नाक के द्वारा नस्य में दिया जाता है।

कभी औषधि द्रव्यों के धुंए का भी सेवन भी नस्य के अंतर्गत कराया जाता है। गले और गर्दन के हिस्से में रहनेवाले दोषों का निर्धारण

नस्य द्वारा होता है । माइग्रेन , अपस्मार (Epilepsy), साइनसााइटिस (sinusitis) में नस्य का उपयोग प्रमुख रूपसे किया जाता है ।

आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म में रक्तमोक्षण क्या होता है ?

दूषित रक्तको शरीरमें से निर्हरण करना रक्तमोक्षण कहा जाता है। असम्यक आहार विहार के कारण वातादि दोष प्रकुपित होकर

रक्त दुष्टि होती है, इस दूषित रक्त को शस्त्र द्वारा, सिरावेध द्वारा या जलौकावचारण द्वारा निर्हरण किया जाता है ।

उसीको रक्तमोक्षण कहा जाता है । रक्त मोक्षण का उपयोग रक्तदोष, त्वचारोग, हाथी पैर (elephantitis),

खालित्य (alopecia ) में होता है। आधुनिक विज्ञान में इस विधि को वेनेसेक्शन (venesection ) कहा जाता है

जिसका अर्थ शरीर में सिराओं में छेद करके दूषित रक्त निकाला जाता है। हृदयावरणशोथ (acute pericarditis )

ह्रदय रोग (chronic heart disease ) फुप्फुसजन्य शोथ (acute pulmonary edema ), न्युमोनिआ, युरेमिया में रक्त

मोक्षण किया जाता है ।

सामान्य चिकित्सा सिद्धान्त और पंचकर्म!

सामान्य चिकित्सा सिद्धान्त और पंचकर्म!

आयुर्वेद के आठ अंग काय चिकित्सा, बालरोग, गृह बाधा, विष तंत्र, शल्य, उर्ध्वांग चिकित्सा, रसायन व् वाजीकरण में

पंचकर्म का विशेष महत्व है।आयुर्वेद का प्रसिद्ध सिद्धान्त है की दोष जब कोष्ठ से शाखाओं में फ़ैल जाते हैं तो

रोगों की उत्पत्ति होती है। सभी व्याधियों का मूल कोष्ठ है।व्यायाम द्वारा, प्रक्षोभसे, ऊष्णतासे ,अधिक तीक्ष्ण पदार्थों के सेवन से,

अहितकर आहार विहार से वायु के गतिशील गुण के कारण दोष कोष्ठ से शाखाओं में, रसादि धातुओं में फ़ैल जाता है।

तत्पश्चात अनुकूल हेतु ( कारण ) प्राप्त होते ही प्रकुपित होके वे रोगोत्पत्ति करते हैं। ऐसे प्रकुपित दोषों को फिर से स्वस्थान,

कोष्ठ में लाने या नज़दीकी मार्गसे निर्हरण करना यह चिकित्सा का सिद्धान्त है। उन्हें क्प्ष्ठ में लाने के पांच उपाय हैं-

१) दोषों की वृद्धि करना

२) उनका विलयन करना

३) दोषोंका पाक करना

४ स्त्रोतसों का मुख खोलकर

५) वात का नियंत्रण करना

ये सभी उपाय पंचकर्म द्वारा ही संभव है। इसतरह पंचकर्म शरीर शुद्धि का श्रेष्ठ उपाय है और आयुर्वेद का अभिन्न अंग है ।

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